शादी खत्म करने का सबसे घटिया तरीका है तीन तलाक़ : सुप्रीम कोर्ट

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चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने आज लगातार दूसरे दिन इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा, ‘ऐसे भी संगठन हैं जो कहते हैं कि तीन तलाक वैध है, परंतु मुस्लिम समुदाय में विवाह विच्छेद का यह सबसे खराब तरीका है और यह वांछनीय नहीं है.’

संविधान पीठ ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने कहा कि यह ऐसा मसला नहीं है जिसकी न्यायिक जांच की जरूरत हो और वैसे भी महिलाओं को निकाहनामा में ही इस बारे में शर्त लिखवाकर तीन तलाक को ‘नहीं’ कहने का अधिकार है. सलमान खुर्शीद व्यक्तिगत हैसियत से इस मामले में न्यायालय की मदद कर रहे हैं.

सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे बहस के कुछ अंश… 

चीफ जस्टिस : कुछ लोग फांसी को भी पाप मानते हैं लेकिन वैध मानते हैं। सवाल है कि जो बात गॉड की नजर में पाप है, वह इंसानी कानून में वैध कैसे हो सकती है।

सलमान खुर्शीद : व्यक्तिगत तौर पर हम यह कह रहे हैं कि यह वैध नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट : दुनिया के कितने देशों में तीन तलाक की प्रथा प्रचलित है। दूसरे देशों में ये प्रथा कैसे खत्म हुई?

सलमान खुर्शीद : शरीयत का हिस्सा तीन तलाक जैसा गुनाह नहीं हो सकता। इसका चलन सिर्फ भारतीय मुसलमानों में है। किसी और देश में तीन तलाक नहीं दिया जाता। ऐसा सिर्फ भारतीय मुसलमान करते हैं। जो भारत में अब हो रहा है, वह विदेशों में पहले ही हो चुका है। इसी के चलते कई देशों में तीन तलाक की प्रथा को खत्म कर दिया गया।

जस्टिस कुरियन जोसफ : क्या निकाहनामे में लिखा जाना चाहिए कि ट्रिपल तलाक नहीं होगा?

सलमान खुर्शीद : इस्लामी कानून के मुताबिक, महिला निकाहनामे में ऐसी शर्त रख सकती है, जिसके मुताबिक उसे तीन तलाक को ‘ना’ कहने की इजाजत हो।

जस्टिस रोहिंग्टन नरिमन : तीन तलाक इस्लाम में निकाह खत्म करने का सबसे बुरा और अवांछनीय तरीका है। हालांकि इसे इस्लाम की विभिन्न विचारधाराओं में वैध माना गया है।

सलमान खुर्शीद : किसी भी व्यक्ति का एक साथ तीन तलाक देना सही नहीं है। तीन तलाक की प्रक्रिया एक साथ एक ही समय में तलाक देने की नहीं है, बल्कि इस प्रक्रिया को पूरा करने में कम से कम तीन महीने का समय होना जरूरी है।

जस्टिस रोहिंग्टन नरिमन : तीन महीने में तलाक हो जाने के बाद अगर फिर शादी करना चाहें तो क्या हो?

सलमान खुर्शीद : इस्लाम के अनुसार तलाक होने पर व्यक्ति दोबारा से नए तरीके से पत्नी से सीधे निकाह नहीं कर सकता। दोबारा निकाह करने के लिए महिला को पहले किसी दूसरे पुरुष से निकाह करना होगा।

जस्टिस रोहिंग्टन नरिमन : इस्लाम में निकाह और तलाक को लेकर मौजूद व्यवस्था में थिअरी और व्यावहारिकता में जो अंतर है…

सलमान खुर्शीद: कोर्ट को इस मामले में कोई कानून नहीं बनाना चाहिए, बल्कि इस्लाम में जो है वही बेहतर है।

तीन तलाक महिला से भेदभाव : राम जेठमलानी
राम जेठमलानी ने भारतीय संविधान का हवाला दिया और कहा कि तीन तलाक संविधान के अनुच्छेद-14 व 15 का उल्लंघन करता है। ट्रिपल तलाक देखा जाए तो मैरिज कॉन्ट्रैक्ट को टर्मिनेट करने की एकतरफा प्रक्रिया है। एक आदमी एकतरफा शादी को तलाक के जरिये टर्मिनेट कर सकता है, लेकिन औरत नहीं। संविधान के अनुच्छेद-15 के सब सेक्शन-4 में कहा गया है कि लिंग आदि के नाम पर भेदभाव नहीं किया जाएगा, लेकिन तीन तलाक के जरिये यह भेदभाव हो रहा है।

चीफ जस्टिस : लेकिन आर्टिकल 15 (4) में तो राज्य को कहा गया है कि भेदभाव नहीं करेगा, तलाक का मसला तो पर्सनल लॉ का है।

राम जेठमलानी : तलाक का अधिकार केवल पुरुषों को ही है, महिलाओं को नहीं। यह कुरान और पैगंबर मोहम्मद के सिद्धांतो के खिलाफ है। कितनी भी दलीलें दी जाएं, लेकिन इस पाप से भरी घिनौनी प्रथा का बचाव नहीं किया जा सकता। कोई भी कानून पति की मर्जी के हिसाब से पत्नी को पूर्व पत्नी बनने देने की इजाजत नहीं देता। संविधान के अनुच्छेद-15 में यह भी कहा गया है कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए काम किया जाएगा, लेकिन यहां महिला के अधिकार को कम किया जा रहा है। जहां तक नीति निर्देशक तत्व का सवाल है, तो आर्टिकल 44 में कॉमन सिविल कोड की बात है और सबके लिए समान नागारिक आचार संहिता की बात कही गई है। जहां तक पति पत्नी के अधिकार का सवाल है तो इस कानून के तहत यह जिम्मेदारी है कि दोनों को एक अधिकार मिले। पति और पत्नी के मामले में उन्हें बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए इसे सिविल कोड के अंदर लाया जाना चाहिए। तीन तलाक की प्रक्रिया अल्लाह की नजर में भी घृणित ऐक्ट है। कोई भी पापमय प्रक्रिया को सही नहीं कह सकता। मैं हिंदू हैं, लेकिन मैंने बाइबल और कुरान दोनों पढ़ें हैं और प्रोफेट ऑफ इस्लाम अन्य तमाम प्रोफेट से महान हैं, यह मैं कह सकता हूं।

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