पटना। बिहार के सरकारी दफ्तरों में रिश्वतखोरी को लेकर एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भ्रष्टाचार का तरीका अब बदल रहा है। कथित तौर पर कुछ अधिकारी खुद सीधे रिश्वत की रकम लेने या उसकी बातचीत में शामिल होने के बजाय अपने आसपास निजी व्यक्तियों को बिचौलिए के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। रिपोर्ट की हेडलाइन में ऐसे निजी लोगों को इस काम के लिए ₹50 हजार तक मासिक भुगतान किए जाने का दावा किया गया है।

रिपोर्ट में सामने आए आरोप अगर सही साबित होते हैं तो मामला केवल रिश्वत लेने तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि सरकारी कार्यालयों के समानांतर चलने वाले एक कथित ‘प्राइवेट नेटवर्क’ की ओर भी इशारा करता है।

अफसर से पहले ‘साइड में बैठे आदमी’ से होती है बात!

रिपोर्ट के मुताबिक कथित व्यवस्था में अधिकारी सीधे तौर पर रिश्वत की डील करने से बचते हैं। इसके लिए कार्यालय या उसके आसपास मौजूद निजी व्यक्ति फरियादी से संपर्क करते हैं और काम कराने के एवज में रकम को लेकर बातचीत करते हैं। सोशल मीडिया पर प्रकाशित रिपोर्ट के विवरण में भी दावा किया गया है कि सरकारी दफ्तरों में अफसरों की जगह निजी कर्मचारी कथित तौर पर रिश्वत की डील कर रहे हैं।

इस तरह की व्यवस्था का सबसे गंभीर पहलू यह है कि यदि कोई निजी व्यक्ति सरकारी कर्मचारी ही नहीं है, फिर भी वह कार्यालय के काम और अधिकारी तक पहुंच के नाम पर पैसे की बातचीत कर रहा है, तो सवाल उठता है कि आखिर उसे सरकारी कामकाज के बीच बैठने और लोगों से डील करने की अनुमति किसने दी?

₹50 हजार तक ‘सैलरी’ देने का दावा

रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला दावा इन कथित निजी कर्मचारियों को मिलने वाली रकम को लेकर है। कहा गया है कि रिश्वत की डील करने के लिए रखे गए ऐसे निजी लोगों को ₹50 हजार रुपए तक महीने का भुगतान किया जा रहा है। दैनिक भास्कर के सोशल मीडिया पोस्ट में भी यही दावा प्रमुखता से सामने रखा गया है।

यदि जांच में ऐसी व्यवस्था की पुष्टि होती है, तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि इतनी बड़ी रकम निजी कर्मचारी को कौन देता है और उसका स्रोत क्या है?

सीधे पैसे नहीं तो क्या कार्रवाई से बचना आसान?

सरकारी तंत्र में रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसे में किसी तीसरे व्यक्ति के माध्यम से कथित लेन-देन कराना अधिकारी और रिश्वत की रकम के बीच सीधा संबंध छिपाने की कोशिश हो सकती है।

हालांकि किसी निजी व्यक्ति द्वारा पैसे लेने मात्र से संबंधित अधिकारी की संलिप्तता स्वतः साबित नहीं होती। यह जांच का विषय होगा कि निजी व्यक्ति किसके निर्देश पर काम कर रहा था, पैसे किसके लिए मांगे गए और रकम अंततः किस तक पहुंची।

सरकारी दफ्तरों में निजी लोगों की मौजूदगी पर भी सवाल

इस खुलासे के बाद एक बड़ा प्रशासनिक सवाल यह भी है कि सरकारी कार्यालयों में ऐसे निजी लोग आखिर किस हैसियत से बैठते हैं?

यदि वे अधिकृत कर्मचारी नहीं हैं तो उन्हें सरकारी फाइलों, आवेदनों, फरियादियों और कार्यालय की आंतरिक प्रक्रिया तक पहुंच कैसे मिलती है? और यदि वे किसी अधिकारी या कर्मचारी के निजी सहयोगी हैं, तो सरकारी कामकाज में उनकी भूमिका किस नियम के तहत निर्धारित है?

इन सवालों के जवाब संबंधित विभागों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकते हैं।

भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यवस्था के सामने नई चुनौती

भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई के लिए शिकायत, निगरानी और ट्रैप जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। लेकिन यदि रिश्वत की बातचीत और रकम का लेन-देन कथित तौर पर किसी तीसरे निजी व्यक्ति के माध्यम से होने लगे तो जांच एजेंसियों के लिए पूरे नेटवर्क और संबंधित अधिकारी के बीच संबंध स्थापित करना महत्वपूर्ण हो जाता है।

रिपोर्ट में सामने आए दावों ने इसलिए बिहार के सरकारी कार्यालयों में पारदर्शिता और निजी व्यक्तियों की भूमिका को लेकर गंभीर बहस खड़ी कर दी है।

अब सबसे बड़ा सवाल-ऐसे नेटवर्क पर कार्रवाई कब?

मामले के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार और संबंधित विभाग इन आरोपों की जांच किस स्तर पर कराते हैं। यदि किसी सरकारी कार्यालय में अनधिकृत निजी व्यक्ति सरकारी काम कराने के नाम पर पैसे की मांग करता पाया जाता है तो उसके साथ-साथ यह पता लगाना भी जरूरी होगा कि उसके पीछे कौन है और वह किसके संरक्षण में काम कर रहा है।

फिलहाल उपलब्ध जानकारी मुख्य रूप से प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट और उसके सोशल-मीडिया विवरण में किए गए दावों पर आधारित है। इसलिए संबंधित अधिकारियों या विभाग की जांच एवं आधिकारिक प्रतिक्रिया के बिना किसी विशेष अधिकारी या कार्यालय को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।

लेकिन रिपोर्ट ने एक गंभीर सवाल जरूर खड़ा कर दिया है-क्या बिहार में रिश्वतखोरी का तरीका अब इतना संगठित हो गया है कि घूस की डील के लिए भी ‘प्राइवेट कर्मचारी’ रखे जा रहे हैं?